Thursday, January 31, 2013

कुछ अनसुना सा

 

एक मद्धिम सी रोशनी

कोहरे की महीन चादर से

लिपटी हुई, और

दिशायें अजनबी सी लगती हैं. 

 

एक अनसुनी सी आहट

धड़कनों में घुली हुई, और

गिलहरियाँ, एकाएक

चौंक सी जाती हैं.

 

कुछ अनसुना सा

सन्नाटा, कभी कभी

अपनी चुप्पी तोड़कर

कुछ कहना चाहता है.

- मनीष

2 comments:

shikha varshney said...

आँखें बंद कर के सुनो सन्नाटे को वो बहुत कुछ कहता है .

शोभना चौरे said...

sannate bahut kuch kah jate hai