वह बसन्त ऋतु का आगमन था, जब बागों में रंग-बिरंगे फूल खिल उठे थे. उस दिन प्रकृति ने कुछ विशेष प्रकार के पुष्प उनके धड़कते दिलों में भी खिला दिये थे.
प्रभात की पहली किरण के साथ वह टोकरी लेकर बाग की तरफ चल पड़ा था, पूजा के लिये उसे कुछ फूल चुनने थे. वहाँ वह उससे पहले पहुँच चुकी थी, अपनी टोकरी के साथ.. गुड़हल के फूल कुछ ऊँचाई पर थे और वह उचकते हुए उन फूलों तक पहुँचने का असफल प्रयास कर रही थी. उसे आता देख, वह अपनी प्रक्रिया तेज़ कर ली, शायद वह जल्द से जल्द उन फूलों तक पहुँच जाना चाहती थी ताकि वह फूल उसके हाथ से निकल न जाये.
उसे इस तरह उछलते देखकर वह मन ही मन मुस्कुराया था और वह मुँह फुलाकर एक तरफ खड़ी हो गयी थी. उसे लगा था कि वह फूल अब यह तोड़कर अपनी टोकरी में रख लेगा. उसे ऐसी मुद्रा में देखकर उसने डाल पकड़कर नीचे झुकाया, डाल पर लगा लाल गुड़हल का फूल उसके फूले मुँह के ठीक सामने था. और वह अनजान बनते हुए दूसरी तरफ देखने लगा था.. उसने उस फूल को जल्दी से तोड़कर अपनी टोकरी में रख लिया… और डाल झूमते हुए वापस ऊँचाईयों पर चली गयी.
कुछ ही देर में यह सामान्य सा हो गया, डाली के फूल सबसे पहले चुन लेने की अन्तः प्रतिस्पर्धा कब समाप्त हो गयी, पता ही नहीं चला . वह चुपचाप डाल नीचे करता और वह धीरे से फूल चुन लेती. टोकरी आधी भर चुकी थी और वह पीले फूलों से लदी डाल के नीचे पहुँच गयी और एक अपेक्षा भरी निगाह से उसने उसे फिर देखा… कुछ ही पलों में एक डाल उसके लिये पुनः झुक गयी थी.. और उसके हिस्से में ढेर सारे फूल आ गये. उसकी टोकरी लगभग भर चुकी थी. उसे लगा कि अब वह चली जायेगी और वह बाग में अकेला ही फूल चुनेगा.
उसके चेहरे के उन भावों को उसने समझ लिया था और वह अपनी टोकरी एक तरफ रखकर उसकी खाली टोकरी उठा ली थी. वह डाल पकड़कर नीचे झुकाता और वह मुस्कुराते हुए उसके लिये फूल चुनती. उसकी टोकरी भी उसने फूलों से भर दी थी.. और उसे पता ही न चला… शायद वह ऊँची डालियों को नीचे झुकाने में तल्लीन हो चुका था.
दोनों अपनी टोकरी ‘थामें’ बाग से निकलने वाले थे कि एक सुर्ख लाल फूल को देखकर वह रूक गयी.. उसके रूकते ही उसने सोचा कि उस फूल को जल्दी से चुनकर उसकी टोकरी में रख दे, आखिर इतने ढेर सारे फूल उसने उसके लिये चुने हैं कम से कम एक फूल तो उसे उसके लिये चुनना ही चाहिये. फूल ज्यादा ऊँचाई पर नहीं था, बल्कि ठीक उसके सामने था. परन्तु न जाने क्यों उसे ऐसा लगा मानों वह फूल गुड़हल के फूलों की तरह ऊँचाई पर लगा है और वह उसी की तरह तेजी से उछलकर उस फूल तक सबसे पहले पहुँचना चाहता है, ताकि वह उसे खो न दे. इस बार उसे ऐसी अवस्था में देखकर वह मुस्कुरा रही थी.
वह वक्त का एक नन्हा सा टुकड़ा था, जिसमें उसके लिये फैसला करना मुश्किल हो रहा था और वह अपनी टोकरी लिये प्रतीक्षा में खड़ी थी. आखिर इस बार उसने अपनी नाजुक भावनाओं की डाली उसके सामने झुका रखी थी और उसे बस वह फूल चुनना था.
- मनीष
12 comments:
फूल चुनने में इतनी समस्या, यहाँ तो एक ढूढ़ों हजारों Fool मिल जाते हैं।
hahaha.. फूलों को अब इसी नज़र से देखा जाने लगा है.. और बाग बगीचों का स्थान ईंट पत्थरों ने ले लिया है. वहाँ Fool ही पनपते हैं. :)
भोर होते ही ठीक ४ बजे मत जी जगा दिया करती थी जा पूजा के लिए फूल तोड़ के ला अगर कुछ बहाना बनाओ तो पापा जी डांट देते और जाना पड़ता.. लेकि वो दिन सबसे खूबसूरत थे... दिन कि शुरुवात जो फूलों से होती थी...
बहुत खूब लिखा है आपने...
बचपन कि एक फोटो जो धुंधली पड गई थी फिर से... साफ़ हो गई ....
बहुत अच्छा लिखा है...
शुक्रिया निशित भाई!!
सुंदर अति सुंदर... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com
वह वक्त का एक नन्हा सा टुकड़ा था, जिसमें उसके लिये फैसला करना मुश्किल हो रहा था और वह अपनी टोकरी लिये प्रतीक्षा में खड़ी थी. आखिर इस बार उसने अपनी नाजुक भावनाओं की डाली उसके सामने झुका रखी थी और उसे बस वह फूल चुनना था.
Wah! Kya gazab likha hai!
bhai ji....sundartam abhivykti....
man ke sukomal bhavnayen....ek muskan banke tair gayin....
शुक्रिया क्षमा जी!!
ऐसी मुस्कान बने रहे बन्धु!! :) ऐसी ही मुस्कान ले आनी थी..
अति सुंदर!
शुक्रिया अनुराग जी!! आपने कहा तो और भी सुन्दर हो सकती है.. :)
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