Thursday 12 November 2009

About Me


२० अगस्त १९८५ की पैदाइश हैं.

अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए

अभी तक जोरों की आजमाइश हैं.


आजमाइश भी कैसी? उन बेजान अक्षरों के साथ जो अपनी जटिलता के साथ मुंह बाए खड़े हैं, आपसी गठबंधन के सहारे सिर पर नाचते रहते हैं और अच्छे खासे सजीव प्राणी को बेजान कर देते हैं.


बचपन से लेकर आज तक उन्हीं अक्षरों से भिडे पड़े हैं. जो कभी ३-४ पन्नें मे सिमट जाते थे, लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती गयी, वैसे वैसे महंगाई और बेरोजगारी की तरह किताबों की मोटाई भी बढ़ने लगी. और सारा भार सुस्त दिमाग और चंचल आँखों पर चला गया. दिमाग का तो पता नहीं लेकिन आँखों की चंचलता दो शीशों में कैद होकर रह गयी हैं.

भेंड़ चाल का अनुगमन करता, मैं भी १२ वीं बाद इंजीनियरिंग की विशेष शाखा पर लटकने को बेताब हुआ.


मशहूर पेड़ (IIT) की शाखा पर लटकने के लिए बड़ी मारा मारी थी, मैंने भी की लेकिन हम ठहरे सुस्त, पेड़ पर चढ़ने का गुर भी नदारत.....


पेड़ पर चढ़ने की कला सीखने इलाहाबाद चले आये. कुछ समय बाद उछलकर इलाहाबाद स्थित बरगद (ALLAHABAD UNIVERSITY) के पेड़ पर चढ़ गए, जिसकी ढेर सारी शाखाएँ लटकीं थीं बरगद के नीचे लिखा था.

QUOT RAMI TOT ARBORES


जिसका अर्थ हर एक इंट्रोडक्टरी क्लास में पूछा जाता हैं लेकिन ये इंगलिश नुमा संस्कृत वाक्य का अर्थ कुछ ही लोग बता पाते हैं.

बरगद के पेड़ से उतर कर मशहूर पेड़ पर चढ़ने का समय आया तो, वे पेड़ (IITs) हमारी जमात के लोगों के लिए प्रतिबंधित कर दिए गए.


हांलाकि आजकल, बड़ी मात्रा में वृक्षारोपण हो रहें हैं जिसपर AICTE की मुहर वाली इंजीनियरिंग की ढेर सारी शाखा खरीद कर लगा दी जाती हैं, जिस पर लटकने हेतु काफी रस्म अदायगी देनी पड़ती हैं.


ऐसे पौधों के माली , काफी हाईटेक प्रचार प्रसार करते हैं, स्वर्ग से अप्सराओं की तस्वीरें खरीद कर बुकलेट में छाप देते हैं जिन्हें देख, लटकने के इच्छुक छात्र, इस फिराक में लटकने को उत्सुक हो जाते हैं कि दहेज़ में सारा पैसा वापस हो ही जाएगा. खैर वह बात दूसरी हैं........ अपनी पर लौटते हैं.

बरगद पर चढा मैं विवश होकर, दूसरे पेड़, जिसपर इंजीनियरिंग की शाखा हो, की तलाश हेतु नीचे उतरने लगा, उतरते वक्त उसी बरगद पर एक इंजीनियरिंग की विशेष शाखा दिखी. (JK INSTITUTE OF APPLIED PHYSICS AND TECHNOLOGY, UNIVERSITY OF ALLAHABAD) लटकने का चार्ज ८००० रुपये सालाना, इतने कम् दाम में पूरे भारतवर्ष में कहीं भी इंजीनियरिंग की विशेष शाखा पर नहीं लटकाया जाता सो हम भी लटक लिए.........

लटके लटके जब महंगाई और बेरोजगारी के बीच आर्थिक मंदी का दौर आया, तो डाल से हाथ छूटा और धरातल पर टपक पड़े.......


धरातल पर आते ही, एक महोदय, जो बगल की शीर्ष शाखा, (M.Sc. Maths) जिसपर बैठ वो पत्तियाँ तोड़कर आसमान के तारों का हिसाब लगा रहे थे, बोले - धरातल का स्कोप अच्छा हैं, भूपर्पटी से लेकर कोर तक स्कोप ही स्कोप हैं, बस फावडा ले लो और खोदना शुरू कर दो.

सो जनाब, तभी से हाथ में फावड़ा हैं और धरातल खोदे जा रहे हैं. अब जान पडा हैं कि शाखा विशेष पर लटके रहने में और धरातल खोदने में क्या अंतर हैं.


लटके रहने से केवल सुगन्धित हवाएं ही आस पास से गुजरती रहीं लेकिन धरातल खोदने के बाद, सेडीमेंट और इसके नाती पोते, फासिल और इनके खानदान वाले विभिन्न प्रकार के प्रधान फासिल, तरह तरह के मिनरल (जो घुल मिल कर दिमाग में केमिकल लोचे का सॉलिड साल्यूशन उत्पन्न कर देते हैं) और पृथ्वी की पैदाइश से लेकर इसके वर्त्तमान चेहरे की बनावट तक का तूफ़ान गुजरता रहता हैं.

शुरूआती दौर हैं, पेड़ पर चढ़ने की कला काम नहीं आ रही हैं, तोते जैसी जी - तोड़ मेहनत वाली कला विकसित करनी होगी.


अक्षरों ने पुनः अपना गठबंधन बना लिया हैं, इस बार का गठबंधन ज़रा जटिल हैं और नए रूप में आकर सिर पर तांडव नृत्य कर रहें हैं. उनके नृत्य से फिजाओं में उमड़े सेडीमेंट (धूल) के गुबार में अपने जीवन पथ की तलाश जारी हैं.

अंत में -

चले थे साथ

उन

मुसाफिरों के

लेकिन

रास्तों में

इतने मोड़ आये

कि

न वे मुसाफिर रहे

न ही वे रास्ते......

****** मनीष ******

Tuesday 10 November 2009

ख़ुशी

साइकिल लेकर
दौड़ता
चेहरे पर
निराभाव लिए

वह,
खेल रहा है
स्वतः, परन्तु
उत्साह
उसकी आँखों से
नहीं झलकता

विवशतापूर्वक
वह साइकिल
खींचता
दिशा दिग्भ्रमित होकर,
लड़खडाता
पुनः और पुनः

उसकी सहायतार्थ
मैं, अपना हाथ
आगे बढाता हूँ
वह झटककर
पुनः उठ खडा होता है

चहरे पर
उदासीनता लिए
दिशा की तरफ
दौड़ पड़ता है
जिसका उसे आभास नहीं


वह खुश है
बेहद खुश है
क्योंकि
वह "अपंग" है

********

Thursday 15 October 2009

इसका शीर्षक आप ही सुझाएँ........




कई वर्षों की

लगातार यात्रा

उन राहों पर

जिनके छोर की तलाश

अब तक है


रास्ते,

जिन पर सुगंध की

मचलती खुशबू है

और

वे आँखे हैं, जिन्हें

दो मोटे शीशे

अपनी आड़ में छिपायें हैं





वर्षों से

इन्हीं रास्तों पर

सुगन्धित नग्न नयन

अपनी चमक छोड़ते रहे



रोशनी से घबराता, मैं


उन रास्तों से


उतरकर


पगडंडियों पर चलने लगता





अतीत की


सुर्ख रोशनी की


लगातार कोशिशों के चलते


आँखे अभ्यस्त हो चली


प्रतीत हुआ


पगडंडियाँ,


कितनी वीरान थीं


सुगन्धित रास्तों की


अपेक्षा





घुमावदार राहों पर

पुनः एक चमक दिखी


जो

दो शीशों को

भेदती हुई

ज्यादा चमकदार हो उठी है

और

उसकी भीनीं रोशनी में

दिख पड़ी है राह

जो

छोर की तरफ ले जाती है



परन्तु

मेरे व्याकुल नेत्र

उन आँखों की

झिलमिल रोशनी को

निहारना चाहते हैं

जो

शीशे के उस पार

अंगड़ाई ले रही है



पलकों के साथ

उतरती सांझ

रंग बिरंगे दृश्यों को

अपने में समेटे हुए

ओस की टपकती बूंदों को

अधरों पर बिखेरती हुई

जुगनुओं के प्रदेश में खो जाती है



उसकी तलाश में

थके कदम

पुनः

घुमावदार रास्तों पर चल पड़ते हैं

और मैं

थके हुए कदमों को

वापस खींचने की

असफल कोशिश करता.............





नोट :- इसका शीर्षक मैं चुन न सका. आप ही सुझाएँ. *****दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये*****







Tuesday 29 September 2009

परीक्षण

 

छुटपन में

सुना था, बुजुर्गों की

महफ़िल में

खैनी चूना आँख में डालने से

आँखें अन्धी हो जाती हैं

 

चंचल मन प्रयोग कर

वास्तविकता को

निहारना

चाहता था

 

इन्सान की आँखें

दर्द महसूस करती हैं, सो

एक कुत्ते की आँख में, मैनें

मिश्रण झोंक दिया

 

उसकी तड़प और

दर्द की अभिव्यक्तियॉ,

मेरे अन्तर्मन को

आत्मग्लानि से भर दिया था

 

उसके नेत्र से बह रहे

मवाद

उसके आँसुओं को

समेटे थे, कहीं न कहीं

 

इतने बरस बाद, पुनः

वे आँसू

मेरे नेत्रों से फिसल पड़ते हैं

 

परीक्षण आज भी होते हैं

प्रयोगशालाओं में, अफसोस

इन्सानी आँसू अब बाहर नहीं आते………

 

परीक्षण

छुटपन में

सुना था, बुजुर्गों की

महफ़िल में

खैनी चूना आँख में डालने से

आँखें अन्धी हो जाती हैं

चंचल मन प्रयोग कर

वास्तविकता को

निहारना

चाहता था

इन्सान की आँखें

दर्द महसूस करती हैं, सो

एक कुत्ते की आँख में, मैनें

मिश्रण झोंक दिया

उसकी तड़प और

दर्द की अभिव्यक्तियॉ,

मेरे अन्तर्मन को

आत्मग्लानि से भर दिया था

उसके नेत्र से बह रहे

मवाद

उसके आँसुओं को

समेटे थे, कहीं न कहीं

इतने बरस बाद, पुनः

वे आँसू

मेरे नेत्रों से फिसल पड़ते हैं

 

परीक्षण आज भी होते हैं

प्रयोगशालाओं में, अफसोस

इन्सानी आँसू अब बाहर नहीं आते………