२० अगस्त १९८५ की पैदाइश हैं.
अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए
अभी तक जोरों की आजमाइश हैं.
आजमाइश भी कैसी? उन बेजान अक्षरों के साथ जो अपनी जटिलता के साथ मुंह बाए खड़े हैं, आपसी गठबंधन के सहारे सिर पर नाचते रहते हैं और अच्छे खासे सजीव प्राणी को बेजान कर देते हैं.
बचपन से लेकर आज तक उन्हीं अक्षरों से भिडे पड़े हैं. जो कभी ३-४ पन्नें मे सिमट जाते थे, लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती गयी, वैसे वैसे महंगाई और बेरोजगारी की तरह किताबों की मोटाई भी बढ़ने लगी. और सारा भार सुस्त दिमाग और चंचल आँखों पर चला गया. दिमाग का तो पता नहीं लेकिन आँखों की चंचलता दो शीशों में कैद होकर रह गयी हैं.
भेंड़ चाल का अनुगमन करता, मैं भी १२ वीं बाद इंजीनियरिंग की विशेष शाखा पर लटकने को बेताब हुआ.
मशहूर पेड़ (IIT) की शाखा पर लटकने के लिए बड़ी मारा मारी थी, मैंने भी की लेकिन हम ठहरे सुस्त, पेड़ पर चढ़ने का गुर भी नदारत.....
पेड़ पर चढ़ने की कला सीखने इलाहाबाद चले आये. कुछ समय बाद उछलकर इलाहाबाद स्थित बरगद (ALLAHABAD UNIVERSITY) के पेड़ पर चढ़ गए, जिसकी ढेर सारी शाखाएँ लटकीं थीं बरगद के नीचे लिखा था.
QUOT RAMI TOT ARBORES
जिसका अर्थ हर एक इंट्रोडक्टरी क्लास में पूछा जाता हैं लेकिन ये इंगलिश नुमा संस्कृत वाक्य का अर्थ कुछ ही लोग बता पाते हैं.
बरगद के पेड़ से उतर कर मशहूर पेड़ पर चढ़ने का समय आया तो, वे पेड़ (IITs) हमारी जमात के लोगों के लिए प्रतिबंधित कर दिए गए.
हांलाकि आजकल, बड़ी मात्रा में वृक्षारोपण हो रहें हैं जिसपर AICTE की मुहर वाली इंजीनियरिंग की ढेर सारी शाखा खरीद कर लगा दी जाती हैं, जिस पर लटकने हेतु काफी रस्म अदायगी देनी पड़ती हैं.
ऐसे पौधों के माली , काफी हाईटेक प्रचार प्रसार करते हैं, स्वर्ग से अप्सराओं की तस्वीरें खरीद कर बुकलेट में छाप देते हैं जिन्हें देख, लटकने के इच्छुक छात्र, इस फिराक में लटकने को उत्सुक हो जाते हैं कि दहेज़ में सारा पैसा वापस हो ही जाएगा. खैर वह बात दूसरी हैं........ अपनी पर लौटते हैं.
बरगद पर चढा मैं विवश होकर, दूसरे पेड़, जिसपर इंजीनियरिंग की शाखा हो, की तलाश हेतु नीचे उतरने लगा, उतरते वक्त उसी बरगद पर एक इंजीनियरिंग की विशेष शाखा दिखी. (JK INSTITUTE OF APPLIED PHYSICS AND TECHNOLOGY, UNIVERSITY OF ALLAHABAD) लटकने का चार्ज ८००० रुपये सालाना, इतने कम् दाम में पूरे भारतवर्ष में कहीं भी इंजीनियरिंग की विशेष शाखा पर नहीं लटकाया जाता सो हम भी लटक लिए.........
लटके लटके जब महंगाई और बेरोजगारी के बीच आर्थिक मंदी का दौर आया, तो डाल से हाथ छूटा और धरातल पर टपक पड़े.......
धरातल पर आते ही, एक महोदय, जो बगल की शीर्ष शाखा, (M.Sc. Maths) जिसपर बैठ वो पत्तियाँ तोड़कर आसमान के तारों का हिसाब लगा रहे थे, बोले - धरातल का स्कोप अच्छा हैं, भूपर्पटी से लेकर कोर तक स्कोप ही स्कोप हैं, बस फावडा ले लो और खोदना शुरू कर दो.
सो जनाब, तभी से हाथ में फावड़ा हैं और धरातल खोदे जा रहे हैं. अब जान पडा हैं कि शाखा विशेष पर लटके रहने में और धरातल खोदने में क्या अंतर हैं.
लटके रहने से केवल सुगन्धित हवाएं ही आस पास से गुजरती रहीं लेकिन धरातल खोदने के बाद, सेडीमेंट और इसके नाती पोते, फासिल और इनके खानदान वाले विभिन्न प्रकार के प्रधान फासिल, तरह तरह के मिनरल (जो घुल मिल कर दिमाग में केमिकल लोचे का सॉलिड साल्यूशन उत्पन्न कर देते हैं) और पृथ्वी की पैदाइश से लेकर इसके वर्त्तमान चेहरे की बनावट तक का तूफ़ान गुजरता रहता हैं.
शुरूआती दौर हैं, पेड़ पर चढ़ने की कला काम नहीं आ रही हैं, तोते जैसी जी - तोड़ मेहनत वाली कला विकसित करनी होगी.
अक्षरों ने पुनः अपना गठबंधन बना लिया हैं, इस बार का गठबंधन ज़रा जटिल हैं और नए रूप में आकर सिर पर तांडव नृत्य कर रहें हैं. उनके नृत्य से फिजाओं में उमड़े सेडीमेंट (धूल) के गुबार में अपने जीवन पथ की तलाश जारी हैं.
अंत में -
चले थे साथ
उन
मुसाफिरों के
लेकिन
रास्तों में
इतने मोड़ आये
कि
न वे मुसाफिर रहे
न ही वे रास्ते......
****** मनीष ******


